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अनुसूचित जनजाति (ST) क्या है?

भारत में अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe - ST) उन जनजातीय समुदायों को कहा जाता है जिन्हें सरकार द्वारा विशेष रूप से पहचान कर सूचीबद्ध किया गया है।

संवैधानिक आधार

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 के अनुसार, राष्ट्रपति किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के लिए जनजातियों को अनुसूचित जनजाति घोषित करते हैं।

पहचान के मुख्य आधार

सरल परिभाषा

ST वे समुदाय हैं जिन्हें भारत सरकार ने विशेष रूप से सूचीबद्ध किया है ताकि उन्हें शिक्षा, रोजगार और विकास में विशेष सुविधाएँ मिल सकें।

ध्यान दें: ये कोई सख्त कानूनी परिभाषा नहीं, बल्कि पहचान के लिए उपयोग किए जाने वाले मानदंड हैं।

झारखंड की अनुसूचित जनजातियाँ (ST सूची)

झारखंड में भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त कुल 32 अनुसूचित जनजातियाँ हैं।

संथाल
उरांव
खड़िया
गोंड
कोल
कंवर
सावर
असुर
बैगा
बंजारा
बथुड़ी
बेदिया
बिंझिया
बिरहोर
बिरजिया
चेरो
चिक-बड़ाइक
गोरायत
हो
करमाली
खरवार
खोंड
किसान
कोरा
कोरवा
लोहरा
महली
माल-पहाड़िया
परहैया
सौरिया-पहाड़िया
भूमिज

झारखंड की जनजातियों का वर्गीकरण

झारखंड में कुल 32 अनुसूचित जनजातियाँ निवास करती हैं। भारतीय मानवशास्त्री ललिता प्रसाद विद्यार्थी ने इन जनजातियों को उनकी सांस्कृतिक विशेषताओं के आधार पर वर्गीकृत किया है।

1. शिकारी एवं संग्रहकर्ता (Hunter-Gatherer)

ये जनजातियाँ जंगलों पर निर्भर रहती हैं और शिकार तथा वन उत्पादों के संग्रह से जीवन यापन करती हैं।

  • बिरहोर
  • कोरवा
  • पहाड़ी खड़िया

2. झूम खेती करने वाली जनजातियाँ (Shifting Agriculture)

ये जनजातियाँ स्थान बदल-बदल कर खेती करती हैं, जिसे झूम खेती कहा जाता है।

  • सौरिया पहाड़िया

3. सरल कारीगर (Simple Artisans)

ये जनजातियाँ हस्तशिल्प और पारंपरिक कारीगरी के कार्यों में संलग्न रहती हैं।

  • महली
  • लोहरा
  • करमाली
  • चिक-बड़ाइक

4. स्थायी कृषक (Settled Agriculturists)

ये जनजातियाँ स्थायी रूप से एक स्थान पर रहकर खेती करती हैं और कृषि इनका मुख्य व्यवसाय होता है।

  • संथाल
  • मुंडा
  • उरांव
  • हो
  • भूमिज
  • आदि

जातीय समूह की पहचान कैसे करें

किसी भी जातीय समूह की पहचान उसकी भाषा, संस्कृति, परंपरा और मूल से की जाती है।

भाषा

समूह द्वारा बोली जाने वाली मुख्य भाषा (जैसे मुण्डारी, संथाली)।

संस्कृति

त्योहार, नृत्य, रीति-रिवाज और परंपराएँ उनकी पहचान होती हैं।

कुल/गोत्र व्यवस्था

सामाजिक ढांचा जैसे मुण्डा समाज में "किल्ली" प्रणाली।

भौगोलिक क्षेत्र

वे किस क्षेत्र या स्थान पर रहते हैं।

जीवनशैली

खान-पान, पहनावा, घर और दैनिक जीवन का तरीका।

मूल/वंश

उनका इतिहास और पूर्वजों से जुड़ी जानकारी।

भारत की जातीय विविधता (Ethnicities of India)

भारत दुनिया के सबसे विविध देशों में से एक है, जहाँ विभिन्न जातीय समूह (Ethnic Groups) अपनी भाषा, संस्कृति, परंपरा और इतिहास के साथ रहते हैं।

परिभाषा (Definition)

भारत की ethnicities वे मानव समूह हैं जिनकी अपनी भाषा, संस्कृति, परंपरा, इतिहास और भौगोलिक पहचान होती है।

भारत के 5 प्रमुख Ethnic Groups

Indo-Aryan

क्षेत्र: उत्तर, पश्चिम, पूर्व भारत

भाषा: हिंदी, बंगाली, पंजाबी

कृषि और शहरी जीवन, विविध त्योहार

Dravidian

क्षेत्र: दक्षिण भारत

भाषा: तमिल, तेलुगु, कन्नड़

प्राचीन संस्कृति, मंदिर परंपरा

Austroasiatic

क्षेत्र: झारखंड, ओडिशा

भाषा: मुण्डारी, संथाली

आदिवासी जीवन, प्रकृति से जुड़ाव

Tibeto-Burman

क्षेत्र: उत्तर-पूर्व भारत

भाषा: बोडो, मिजो

पहाड़ी जीवन, जनजातीय परंपरा

Andamanese

क्षेत्र: अंडमान-निकोबार

भाषा: स्थानीय भाषाएँ

प्राचीन जनजातीय जीवन

जातीय पहचान कैसे बनती है?

भाषा
संस्कृति
परंपरा
भौगोलिक क्षेत्र
इतिहास / मूल

Ethnicity = Language + Culture + Tradition + Origin + Region

भारत की विविधता

  • 1000+ भाषाएँ और बोलियाँ
  • 700+ अनुसूचित जनजातियाँ (ST)
  • हर राज्य की अलग संस्कृति
  • विभिन्न धर्म और परंपराएँ

महत्वपूर्ण बात

Ethnicity और caste अलग होते हैं। Ethnicity भाषा और संस्कृति से जुड़ी होती है, जबकि caste सामाजिक व्यवस्था है।

भारत विभिन्न जातीय समूहों का देश है, जहाँ हर समूह की अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान है।

आदिवासी या जनजाति कौन?

आदिवासी या जनजाति वे समुदाय होते हैं जो अत्यंत प्राचीन काल से किसी निश्चित क्षेत्र में निवास करते आ रहे हैं और अपनी परंपरागत सामाजिक व्यवस्था के अनुसार जीवन व्यतीत करते हैं।

इनका समाज गोत्र या कबीले पर आधारित होता है, जिनके नाम अक्सर पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, फल-फूल या प्रकृति से जुड़े होते हैं। इसे टोटेमिक व्यवस्था कहा जाता है।

इन समुदायों की अपनी अलग भाषा या बोली, संस्कृति, रीति-रिवाज और धार्मिक मान्यताएँ होती हैं। ये मुख्यधारा के समाज से अलग अपनी परंपराओं के अनुसार संचालित होते हैं।

भारत में जिन समुदायों को सरकार द्वारा सूचीबद्ध किया गया है, उन्हें अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe - ST) कहा जाता है।

विद्वानों के अनुसार, जनजाति एक ऐसा समूह होता है जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होता है, एक ही भाषा बोलता है और बाहरी लोगों से अपनी पहचान बनाए रखने के लिए एकजुट रहता है।

जिनका शासन और परंपरा हिंदू सामाजिक व्यवस्था से अलग विकसित हुआ हो

👉 आदिवासी = भारत के मूल निवासी, जिनकी अपनी अलग संस्कृति, भाषा और पारंपरिक पहचान होती है।

आदिवासी / जनजाति की परिभाषा

अर्थ (Meaning)

जनजाति से तात्पर्य आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर व्यक्तियों के ऐसे समूह से है जो सामान्य भाषा बोलते हैं तथा बाहरी आक्रमणों से अपनी रक्षा के लिए संगठित रहते हैं।

प्रमुख विद्वानों के अनुसार

जेकब्स एवं स्टर्न

A cluster of village communities which share a common territory, language and culture and are economically interwoven, is often also designated a Tribe.

अर्थात समान भूमि, भाषा, संस्कृति तथा आर्थिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े ग्रामीण समुदायों का समूह जनजाति कहलाता है।

डॉ० मजूमदार

A Tribe is a collection of families bearing a common name, occupying the same territory, speaking the same language and observing taboos regarding marriage and occupation.

अर्थात समान नाम, समान भाषा, समान क्षेत्र तथा विवाह और व्यवसाय से जुड़े नियमों का पालन करने वाले परिवारों का समूह जनजाति कहलाता है।

इम्पीरियल गजेटियर

A Tribe is a collection of families having a common name, dialect and occupying a common territory, often practicing endogamy.

अर्थात समान नाम, बोली और क्षेत्र वाले तथा अपने समुदाय के भीतर विवाह करने वाले परिवारों का समूह जनजाति कहलाता है।

संक्षेप में

जनजाति वह संगठित समुदाय है जो एक निश्चित भू-भाग में निवास करता है, जिसकी अपनी भाषा, संस्कृति, गोत्र व्यवस्था और टोटेमिक पहचान होती है तथा जो अपने पारंपरिक नियमों और सामाजिक संरचना के अनुसार जीवन यापन करता है।

जनजाति की विशेषताएँ

जनजाति समाज की कुछ प्रमुख विशेषताएँ या लक्षण निम्न प्रकार हैं:

1. गोत्र/परिवार समूह

जनजाति कई गोत्रों (कबीले) का समूह होती है। परिवार इसकी मूल इकाई है।


कई गोत्रों का समूह – जनजाति का निर्माण कई गोत्रों के संकलन से होता है। एक गोत्र एक परिवार ही होता है। जनसंख्या की वृद्धि के कारण परिवारों की संख्या में वृद्धि होती है। परिवार ही जनजाति समाज की मौलिक इकाई है। जनजाति परिवार या गोत्र का ही एक विस्तृत रूप है जैसे – मुण्डा जनजाति में सोय, पूर्ति, बोदरा, तिडु, भोगरा इत्यादि।
संथाल जनजाति में, हेम्ब्रम, हांसदा, सोरेन, मरांडी, बेसरा इत्यादि।
कुड़मी जनजाति में सांखुआर, टिड़वार, मुतरुआर, काडुआर आदि।
कुड़ुख (उरांव) जनजाति में – कुजूर, मिंज, खेस, किरपलिया, सांखुआर, तिग्गा इत्यादि।
खड़िया जनजाति में – बा, किडो, बिलुंग इत्यादि।
हो जनजाति में – तुडू, तिगु, लुगुन इत्यादि। इन गोत्रों के अंग्रेजी में Tribe कहा जाता है, जिसका अर्थ है गण या दल।

2. टोटेमिक व्यवस्था

जनजातियाँ पशु, पक्षी, पेड़-पौधे आदि से अपना संबंध मानती हैं, जिसे टोटेम कहा जाता है।




जनजाति टोटेमिक होते हैं – अंग्रेजी शब्द Totem का अर्थ विश्वास – ट्राइबल संगठित जनजाति किसी भौतिक पदार्थ, पशु – पक्षी, पेड़-पौधे, फूल-फल, कीड़े-मकोड़े, जलजीव आदि से अपना एक रहस्यमय संबंध होने का दावा करते हैं वे ही ट्राइब या गोत्र के नाम से जाने पहचाने जाते हैं। उन पर टोटेम या विश्वास मानते हैं।

3. टैबू (निषेध)

धार्मिक या सामाजिक नियम जिनका उल्लंघन नहीं किया जाता, जैसे कुछ वस्तुओं का उपयोग या भोजन निषिद्ध होना।




ऐसे नियम जिनके अनुसार कुछ चीजें करना या उपयोग करना सख्त मना होता है (धार्मिक/सांस्कृतिक कारणों से)

📌 उदाहरण (Example of Taboo)


👉 मुण्डा जनजाति में “सोय” गोत्र इस गोत्र के लोग किसी विशेष पशु/पक्षी (जैसे टोटेम से जुड़ा जीव) को ❌ मारते नहीं ❌ खाते नहीं क्योंकि वे उसे अपना पवित्र प्रतीक (Totem) मानते हैं 📌 एक और आसान उदाहरण


👉 अगर किसी जनजाति का टोटेम “पेड़ (जैसे साल)” है: वे उस पेड़ को काटते नहीं उसे नुकसान नहीं पहुँचाते उसे पवित्र मानकर उसकी पूजा करते हैं

4. विशिष्ट नाम

प्रत्येक जनजाति का अपना एक विशेष नाम होता है जिससे उसकी पहचान होती है।

5. निश्चित भू-भाग

हर जनजाति का एक निश्चित निवास क्षेत्र होता है, जहाँ वे पारंपरिक रूप से रहते हैं।

6. सामान्य भाषा

प्रत्येक जनजाति की अपनी भाषा या बोली होती है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है।

7. सामुदायिक भावना

जनजाति के सदस्य एक-दूसरे के प्रति सहयोग और एकता की भावना रखते हैं।

8. विवाह व्यवस्था

जनजातियाँ प्रायः अपनी जनजाति के भीतर विवाह करती हैं, परंतु गोत्र के बाहर।

9. सामाजिक नियम (टैबू सिस्टम)

विवाह, पेशा और सामाजिक व्यवहार के लिए निश्चित नियम होते हैं, जिनका पालन अनिवार्य होता है।



बिट्लाहा व्यवस्था – जनजातियों की अपनी सामाजिक नियम श्रृंखला होती है। स्वगोत्रीय विवाह तथा बहिर्जनजातीय विवाह जनजातीय नियमानुसार निषिद्ध होता है। कुछ के विधि निषेध मानना पड़ता है अन्यथा, ऐसा होने पर उस व्यक्ति अथवा जिनकी सलाह से विवाह होता है उन्हें बिट्लाहा घोषित कर सामाजिक दण्ड दिया जाता है।

बिटलाहा व्यवस्था

जनजातीय समाज में सामाजिक नियमों का पालन अनिवार्य होता है। नियम तोड़ने पर व्यक्ति को "बिटलाहा" घोषित कर दंड दिया जाता है।

नियम

जनजाति में विवाह और सामाजिक व्यवहार के लिए निश्चित नियम होते हैं।

निषेध

स्वगोत्र विवाह और कुछ अन्य संबंध जनजातीय नियमों के अनुसार वर्जित होते हैं।

उल्लंघन

यदि कोई व्यक्ति नियम तोड़ता है, तो उसे दोषी माना जाता है।

दंड

व्यक्ति को "बिटलाहा" घोषित कर सामाजिक दंड या बहिष्कार किया जाता है।

👉 बिटलाहा = जनजातीय समाज का सामाजिक दंड प्रणाली

10. विशिष्ट संस्कृति

हर जनजाति की अपनी अलग संस्कृति, रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और जीवन शैली होती है।

11. राजनीतिक संगठन

जनजातियों की अपनी पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था होती है।

12. अर्थव्यवस्था

जनजातियाँ सामान्यतः आत्मनिर्भर होती हैं और कृषि, जंगल एवं श्रम पर निर्भर रहती हैं।

13. नातेदारी का महत्व

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संबंधों में नातेदारी (kinship) का महत्वपूर्ण स्थान होता है।

ट्राइब या गोष्ठी

मनुष्य के विकास क्रम में प्रारम्भिक काल से आजतक जनजातियों को कई स्तरों के परिवर्तन का सामना करना पड़ा है। प्रारम्भिक अवस्था में मानव जंगली जीवन व्यतीत करता था, जिसे प्रारम्भिक वय स्तर कहा गया है।

विद्वानों के अनुसार विकास को विभिन्न स्तरों में बाँटा गया है — प्रथम वय, द्वितीय वय, तृतीय वय, इसके बाद बर्बर, पशुपालन और आधुनिक विकासवादी स्तर।

प्रारम्भिक जीवन

प्रारम्भिक समय में मनुष्य बिना वस्त्र के रहता था, झुंड में जीवन बिताता था और आग का ज्ञान नहीं था। वह फल, फूल, कंद-मूल और कच्चे मांस से अपना जीवन यापन करता था।

वे गुफाओं और कंदराओं में रहते थे तथा सामाजिक संबंध (जैसे परिवार या नातेदारी) विकसित नहीं हुए थे।

विकास और परिवर्तन

समय के साथ मनुष्य में चेतना का विकास हुआ। उसने पेड़ों की छाल और पशुओं की खाल पहनना शुरू किया।

अलग-अलग झुंडों के बीच संपर्क बढ़ा, जिससे भाषा, सहयोग और स्थायी निवास की भावना विकसित हुई।

गोष्ठी और पहचान

विभिन्न झुंडों के संगठित होने से गोष्ठियों का निर्माण हुआ। इनकी पहचान पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, प्राकृतिक वस्तुओं आदि के नामों पर आधारित थी।

यही पहचान आज भी जनजातियों के गोत्र और टोटेम के रूप में देखी जाती है।

ट्राइब (Tribe) का अर्थ

जनजाति के मूल संगठन को अंग्रेजी में "Tribe" कहा जाता है। कई ट्राइब मिलकर कबीला बनाते हैं।

उदाहरण

मुण्डा, संथाल, कुड़ुख (उरांव), खड़िया, हो आदि जनजातियाँ अपने-अपने गोष्ठियों और कबीले के रूप में जानी जाती हैं।

टोटेम विश्वास

कबीलाई आदिम ट्राइबल जनसमाज या आदिम जनजाति प्रारम्भिक स्तरों में विभिन्न गण या दलों में विभक्त थे। मानसिक चिंतन भावना की जागृति के फलस्वरूप अपरिहार्य कारणों से उन गण या दलों की विशेष पहचान की आवश्यकता हुई। आदिम जनमन प्रकृतिक वातावरण में गुजारे करने के कारण प्रकृति से उपलब्ध वनस्पति, जीव-जंतु, पक्षियों, जलजीव, कीट-पतंग तथा भौतिक पदार्थों के नामों से ही पहचाने जाने लगे। जैसे – जनजाति मुंडा कबीला में – सोय ट्राइब का टोटेम सोलमाछ, पूर्ति का चूहा, होरो का कछुआ, बरला का बड़ का वृक्ष, कण्डुलना का कुशुम का फल इत्यादि।

जनजाति संथाल कबीला के ट्राइब मुर्मू का टोटेम नीलगाय, हेम्ब्रम का पानपत्ता, बेसरा का बाज पक्षी, चौडें का छिपकली आदि। जनजाति कुड़मी कबीला के ट्राइब केसरियार का टोटेम केसर घास, चिलवार का चील पक्षी, गिलुआर का घोंघा, मुतरुआर का माकड़ा, सांखुआर का शंख या साखा इत्यादि। कुड़ुख (उरांव) कबीला के ट्राइब एक्का का टोटेम कछुआ , तिर्की का टेरी पक्षी, कुजूर का कुजरी गाछ, तिग्गा का बंदर, किसोपट्टा का घिसुर या बरहा आदि।

जनजाति खड़िया कबीला के ट्राइब बा का टोटेम धान, कीड़ो का बाघ, कुल्लु का कछुआ, साओ का चूहा, टोपू का लकड़ी खोदने वाली पक्षी इत्यादि है। इसी तरह जनजाति हो कबीला के ट्राइब बागे का टोटेम बाघ, कुल्लुड़िया का कछुआ, तिग्गा का चूहा या बिल, तुडू का सियार, लुगुन का टोटेम तसर कीड़ा आदि हैं।

इस तरह से आदिम निवासी आदिवासी कबीले के लोग विभिन्न किली तथा चिन्ह से पहचाने जाने लगे। आदिकाल से आदिम निवासी आदिम जाति या जनजाति आदिवासियों की आदिम पहचान का चिन्ह आजतक मूल रूप में ही बरकरार है।

मानव समाज क्रमिक विकास की प्रक्रिया का परिणाम है। इस प्रक्रिया का प्रभाव आदिवासी समाज पर भी पड़ा है। आदिवासी या जनजातीय सामाजिक संगठन में वंश की मूल की उत्पत्ति का आधार मात्र सामाजिक तथा

सांस्कृतिक पहलू ही नहीं है, अपितु भौतिक पहलुओं का भी उत्पत्ति में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उत्पत्ति के संबंध में जनजातीय समाजों में जो आधार प्रस्तुत किये जाते हैं, वे श्रद्धा, भक्ति, आदर के रूप में देखे जाते हैं। इन्हें ही ट्राइब या गोष्ठी माना जाता है। टोटेम को हिन्दी में गोष्ठी-चिन्ह या गण-चिन्ह कहते हैं। टोटेम किसी पेड़-पौधे, वनस्पति, वस्तु आदि के नामों से गोष्ठी युक्त मनुष्यों की पहचान है।

टोटेम गोष्ठी का ही चिन्ह है। इसका आधार एक जनजातीय कबीला के अन्तर्गत अपनी टोटेम को छोड़कर अन्य टोटेम में विवाह करते हैं क्योंकि एक गोष्ठी के लोग एक ही रक्त सम्बन्ध को मानते हैं। टोटेम एक पवित्र धारणा है। इसके प्रति सदस्यों की विशेष श्रद्धा भक्ति और आदर भाव होता है, इसलिए इसके सभी सदस्य इसकी पूजा करते हैं।

टोटेम शब्द सर्वप्रथम एक अंग्रेज जे. लॉंग ने 1791 ई० में उत्तरी अमेरिका के रेड इंडियनों से ग्रहण किया। डॉ० एफ० मैकलेनन पहले लेखक थे जिन्होंने आदिम सामाजिक संस्था के रूप में टोटेमवाद के महत्व को समझा।

आस्ट्रेलिया के अतिरिक्त यहाँ अफ्रीका के कुछ भागों, उत्तरी अमेरिका के कुछ रेड इंडियन कबीलों और दक्षिणी अमेरिका के दो कबीलों में यह संस्था पायी जाती है। भारत में भी बहुतांश कबीलें या तो टोटेम आधार पर संगठित हैं या विशेष पशुओं और पौधों को पवित्र मानते हैं या उन विशेष पशुओं और पौधों को खाना या नष्ट करना धार्मिक विधि निषेध मानते हैं।

टोटेम समूह सामाजिक जीवन की बढ़ती हुई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक से अधिक टोटेम समूहों में बंटते हैं। एक टोटेम कुल के सदस्यों की संख्या में वृद्धि के कारण वे उप-टोटेमों में विभक्त हो जाते हैं, उसको उस मूल टोटेम की Fratry या शाखा कहते हैं।

झारखण्ड क्षेत्र के कबीले मुण्डा-संथाल कुड़मी-कुड़ुख (उरांव) खड़िया हो आदि में जनसंख्या वृद्धि के कारण कबीले के मूल टोटेम में एक, दो या दो से अधिक Fratry या शाखाएँ पायी जाती हैं।

कबीले के सामाजिक क्रियाओं में स्वतंत्र टोटेम जैसा व्यवहार होता है। एक अन्य ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि एक ही भौगोलिक क्षेत्र के निवासी पड़ोसी कबीलों में परस्पर नातेदारी सम्बन्धों के रहते हुए भी उनमें समान टोटेम पाये जाते हैं।

टोटेम संबंधी जानकारी क्रम में देश विदेश के विद्वान जैसे थार्सटन, रिजले, रायसले, कूक एवं आयार आदि की लिखित किताबों से टोटेमों की सूची प्रस्तुत करने पर सम्भवत किसी भी प्रकार के कीड़े-मकोड़े, पेड़-पौधे, फूल-फल, जलजीव, घास-पात, पशु-पक्षी, भौतिक पदार्थ आदि नहीं छूटेंगे।

इस तरह से ट्राइबल टोटेमों के नामकरण की व्यवस्था आदिम मानव समाज संगठन की आदिम जनजातीय विशेषता है।

लुईस हेनरी मोर्गन के अनुसार जनजाति या आदिवासियों की गोष्ठीय टोटेम की पहचान पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े के नामों से ही की गई है।

मोर्गन ने आगे कहा है कि गोष्ठियों में जनसंख्या की वृद्धि के कारण जीवन-यापन के लिए अपने ही प्राचीन परम्परागत निश्चित निवास भूमि से स्थान परिवर्तन तथा गोष्ठी की शाखा-प्रशाखा का उद्भव हुआ है।

इस तरह आदिम जनजाति कबीले के मनुष्य के लिए शादी-विवाह के अवसर पर अपनी टोटेम की पहचान निहायत जरूरी हुई, क्योंकि जनजातियों में स्वगोत्रीय या सगोत्रीय में शादी-विवाह धार्मिक निषेध माना गया है।

आदिम टोटेमिक समाज के स्वरूप के सम्बन्ध में एम० मोरेट का कहना है कि –

The true totemic society rematks, M. Moret knows niether kings nor subjects. It is democratic or communistic, all the members of the sept live is it on a footing of equality with respect to their totem.

अर्थात – एम० मोरेट का कहना है कि प्राचीन टोटेम समाज में न राजा न ही प्रजा। यह समाज गणतांत्रिक अथवा साम्यवादी गोष्ठी या टोटेम के सभी मनुष्य ही टोटेम के सम्बन्ध में बराबर-बराबर हैं।