कबीलाई आदिम ट्राइबल जनसमाज या आदिम जनजाति प्रारम्भिक स्तरों में विभिन्न गण या दलों में विभक्त थे। मानसिक
चिंतन भावना की जागृति के फलस्वरूप अपरिहार्य कारणों से उन गण या दलों की विशेष पहचान की आवश्यकता हुई। आदिम
जनमन प्रकृतिक वातावरण में गुजारे करने के कारण प्रकृति से उपलब्ध वनस्पति, जीव-जंतु, पक्षियों, जलजीव, कीट-पतंग
तथा भौतिक पदार्थों के नामों से ही पहचाने जाने लगे। जैसे – जनजाति मुंडा कबीला में – सोय ट्राइब का टोटेम
सोलमाछ, पूर्ति का चूहा, होरो का कछुआ, बरला का बड़ का वृक्ष, कण्डुलना का कुशुम का फल इत्यादि।
जनजाति संथाल कबीला के ट्राइब मुर्मू का टोटेम नीलगाय, हेम्ब्रम का पानपत्ता, बेसरा का बाज पक्षी, चौडें का
छिपकली आदि। जनजाति कुड़मी कबीला के ट्राइब केसरियार का टोटेम केसर घास, चिलवार का चील पक्षी, गिलुआर का घोंघा,
मुतरुआर का माकड़ा, सांखुआर का शंख या साखा इत्यादि। कुड़ुख (उरांव) कबीला के ट्राइब एक्का का टोटेम कछुआ , तिर्की का टेरी
पक्षी, कुजूर का कुजरी गाछ, तिग्गा का बंदर, किसोपट्टा का घिसुर या बरहा आदि।
जनजाति खड़िया कबीला के ट्राइब बा का टोटेम धान, कीड़ो का बाघ, कुल्लु का कछुआ, साओ का चूहा, टोपू का लकड़ी
खोदने वाली पक्षी इत्यादि है। इसी तरह जनजाति हो कबीला के ट्राइब बागे का टोटेम बाघ, कुल्लुड़िया का कछुआ,
तिग्गा का चूहा या बिल, तुडू का सियार, लुगुन का टोटेम तसर कीड़ा आदि हैं।
इस तरह से आदिम निवासी आदिवासी कबीले के लोग विभिन्न किली तथा चिन्ह से पहचाने जाने लगे। आदिकाल से आदिम निवासी
आदिम जाति या जनजाति आदिवासियों की आदिम पहचान का चिन्ह आजतक मूल रूप में ही बरकरार है।
मानव समाज क्रमिक विकास की प्रक्रिया का परिणाम है। इस प्रक्रिया का प्रभाव आदिवासी समाज पर भी पड़ा है। आदिवासी
या जनजातीय सामाजिक संगठन में वंश की मूल की उत्पत्ति का आधार मात्र सामाजिक तथा
सांस्कृतिक पहलू ही नहीं है, अपितु भौतिक पहलुओं का भी उत्पत्ति में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उत्पत्ति के संबंध
में जनजातीय समाजों में जो आधार प्रस्तुत किये जाते हैं, वे श्रद्धा, भक्ति, आदर के रूप में देखे जाते हैं।
इन्हें ही ट्राइब या गोष्ठी माना जाता है। टोटेम को हिन्दी में गोष्ठी-चिन्ह या गण-चिन्ह कहते हैं। टोटेम किसी
पेड़-पौधे, वनस्पति, वस्तु आदि के नामों से गोष्ठी युक्त मनुष्यों की पहचान है।
टोटेम गोष्ठी का ही चिन्ह है। इसका आधार एक जनजातीय कबीला के अन्तर्गत अपनी टोटेम को छोड़कर अन्य टोटेम में
विवाह करते हैं क्योंकि एक गोष्ठी के लोग एक ही रक्त सम्बन्ध को मानते हैं। टोटेम एक पवित्र धारणा है। इसके
प्रति सदस्यों की विशेष श्रद्धा भक्ति और आदर भाव होता है, इसलिए इसके सभी सदस्य इसकी पूजा करते हैं।
टोटेम शब्द सर्वप्रथम एक अंग्रेज जे. लॉंग ने 1791 ई० में उत्तरी अमेरिका के रेड इंडियनों से ग्रहण किया। डॉ०
एफ० मैकलेनन पहले लेखक थे जिन्होंने आदिम सामाजिक संस्था के रूप में टोटेमवाद के महत्व को समझा।
आस्ट्रेलिया के अतिरिक्त यहाँ अफ्रीका के कुछ भागों, उत्तरी अमेरिका के कुछ रेड इंडियन कबीलों और दक्षिणी
अमेरिका के दो कबीलों में यह संस्था पायी जाती है। भारत में भी बहुतांश कबीलें या तो टोटेम आधार पर संगठित हैं
या विशेष पशुओं और पौधों को पवित्र मानते हैं या उन विशेष पशुओं और पौधों को खाना या नष्ट करना धार्मिक विधि
निषेध मानते हैं।
टोटेम समूह सामाजिक जीवन की बढ़ती हुई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक से अधिक टोटेम समूहों में बंटते हैं।
एक टोटेम कुल के सदस्यों की संख्या में वृद्धि के कारण वे उप-टोटेमों में विभक्त हो जाते हैं, उसको उस मूल टोटेम
की Fratry या शाखा कहते हैं।
झारखण्ड क्षेत्र के कबीले मुण्डा-संथाल कुड़मी-कुड़ुख (उरांव) खड़िया हो आदि में जनसंख्या वृद्धि के कारण कबीले
के मूल टोटेम में एक, दो या दो से अधिक Fratry या शाखाएँ पायी जाती हैं।
कबीले के सामाजिक क्रियाओं में स्वतंत्र टोटेम जैसा व्यवहार होता है। एक अन्य ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि एक
ही भौगोलिक क्षेत्र के निवासी पड़ोसी कबीलों में परस्पर नातेदारी सम्बन्धों के रहते हुए भी उनमें समान टोटेम
पाये जाते हैं।
टोटेम संबंधी जानकारी क्रम में देश विदेश के विद्वान जैसे थार्सटन, रिजले, रायसले, कूक एवं आयार आदि की लिखित
किताबों से टोटेमों की सूची प्रस्तुत करने पर सम्भवत किसी भी प्रकार के कीड़े-मकोड़े, पेड़-पौधे, फूल-फल, जलजीव,
घास-पात, पशु-पक्षी, भौतिक पदार्थ आदि नहीं छूटेंगे।
इस तरह से ट्राइबल टोटेमों के नामकरण की व्यवस्था आदिम मानव समाज संगठन की आदिम जनजातीय विशेषता है।
लुईस हेनरी मोर्गन के अनुसार जनजाति या आदिवासियों की गोष्ठीय टोटेम की पहचान पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े के नामों
से ही की गई है।
मोर्गन ने आगे कहा है कि गोष्ठियों में जनसंख्या की वृद्धि के कारण जीवन-यापन के लिए अपने ही प्राचीन परम्परागत
निश्चित निवास भूमि से स्थान परिवर्तन तथा गोष्ठी की शाखा-प्रशाखा का उद्भव हुआ है।
इस तरह आदिम जनजाति कबीले के मनुष्य के लिए शादी-विवाह के अवसर पर अपनी टोटेम की पहचान निहायत जरूरी हुई,
क्योंकि जनजातियों में स्वगोत्रीय या सगोत्रीय में शादी-विवाह धार्मिक निषेध माना गया है।
आदिम टोटेमिक समाज के स्वरूप के सम्बन्ध में एम० मोरेट का कहना है कि –
The true totemic society rematks, M. Moret knows niether kings nor subjects. It is democratic or
communistic, all the members of the sept live is it on a footing of equality with respect to their totem.
अर्थात – एम० मोरेट का कहना है कि प्राचीन टोटेम समाज में न राजा न ही प्रजा। यह समाज गणतांत्रिक अथवा साम्यवादी
गोष्ठी या टोटेम के सभी मनुष्य ही टोटेम के सम्बन्ध में बराबर-बराबर हैं।