मुण्डा कई बाह्यविवाही (exogamous) कुलों में विभाजित होते हैं। मुण्डाओं में इन कुलों को **किली (Killi)** कहा जाता है, जो संस्कृत के शब्द **कुल (Kula)** के समान है। मुण्डा समाज पितृवंशीय (patrilineal) होता है, और किली का नाम पिता से पुत्र को प्राप्त होता है। परंपरा के अनुसार, एक ही किली के लोग एक ही पूर्वज के वंशज माने जाते हैं। मुण्डाओं के कुल टोटेमिक (totemic) मूल के होते हैं। कुछ प्रमुख कुल इस प्रकार हैं:
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मुण्डा मुख्य रूप से भारत के पूर्वी राज्यों — झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा — में निवास करते हैं। झारखंड में इनकी प्रमुख उपस्थिति खूंटी, रांची, सिमडेगा, पश्चिम सिंहभूम, गुमला, पूर्वी सिंहभूम और रामगढ़ जिलों में है। ओडिशा के सुंदरगढ़ और सम्बलपुर जिलों में तथा पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी, पश्चिम मेदिनीपुर और उत्तर 24 परगना जिलों में भी ये पाए जाते हैं। इसके अलावा, मुण्डा जनजाति पड़ोसी राज्यों छत्तीसगढ़ और बिहार में भी कहीं-कहीं बिखरे रूप में निवास करती है। साथ ही, ये असम, त्रिपुरा और मिज़ोरम जैसे उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी पाए जाते हैं, विशेषकर असम के चाय बागानों वाले क्षेत्रों में, जहाँ वे औपनिवेशिक काल में चाय बागान मजदूर के रूप में काम करने के लिए गए थे। भारत के अलावा, मुण्डा लोग पड़ोसी देशों जैसे बांग्लादेश और नेपाल में भी निवास करते हैं।
त्रिपुरा में मुण्डा लोगों को मुरा के नाम से भी जाना जाता है। झारखंड के कोल्हान क्षेत्र में मुण्डा लोगों को अन्य समुदायों द्वारा अक्सर तमाड़िया कहा जाता है।
झारखंड के कोल्हान क्षेत्र में मुण्डा-मानकी शासन व्यवस्था प्रचलित थी, जिसके माध्यम से मुण्डा समुदाय अपने गाँवों का संचालन करता था।
गाँव का प्रमुख
गाँव का संदेशवाहक
गाँव का पुजारी
पाहन का सहायक
15-20 गाँवों का प्रमुख
कर संग्रह करने वाला अधिकारी
ओडिशा की हो, भूमिज, भुइयां, सौंती और खोंड जनजातियों तथा असम के चुटिया समुदाय में देओरी (Deori) पुजारी की परंपरा भी प्रचलित रही है।
छोटानागपुर क्षेत्र में मुण्डा समुदाय ने अपने गाँव के पुजारी के रूप में पाहन (Pahan) को अपनाया है।
सामाजिक व्यवस्था – मुंडा समाज पितृसत्तात्मक बनता जा रहा है। परिवार को किली या ट्राइब का नाम दिया गया है। प्रत्येक किली का अलग अलग नाम है, इसका उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। किली टोटेमिक होते हैं। किलियों का मूल संगठन कबीला कहा जाता है। सामाजिक प्रशासन के लिये कई गांवों को मिलाकर पड़हा बाईसी की व्यवस्था है। पड़हा व्यवस्था में मुंडा और मानकी का पद सर्वोच्च है। इनके पुरोहित या पुजारियों को देवरी या पाहन कहते हैं। इनकी अपनी पंचायत व्यवस्था है। मुंडा जनजाति में पड़हा बाईसी अथवा पंचायत का निर्णय न मानने पर उस दोषी व्यक्ति को सामाजिक दण्ड दिया जाता है। यहाँ तक कि उस व्यक्ति को गांव से बाहर भी कर दिया जाता है। वर्तमान में लोग शिक्षा में रुचि ले रहे हैं। स्त्री-पुरुष उच्च शिक्षा में शिक्षित होते जा रहे हैं। इनकी अपनी कबीलावाची भाषा है जिसका नाम मुंडारी है।
जनजाति या आदिवासियों की आदिम परम्परागत जीवन शैली है। जन्म-विवाह- मृत्यु संस्कार, पर्व, पाली, धर्म, जादू-टोना, आचार अनुष्ठान आदि में आदिमता का स्वरूप अंकित है।
धर्म – इस जनजाति के लोग दुःख तथा बीमारी या अकाल के समय विभिन्न देवताओं की पूजा करके उन्हें प्रसन्न करते हैं। ये देवताओं के अतिरिक्त परमेश्वर ‘सिंग-बोंगा’ में विश्वास करते हैं। सारना इनका पवित्र मंदिर है। जिसमें इनकी देवी देवताओं का वास होता है।
गाँव के किसी पुराने वृक्ष के नीचे आखड़ा होता है। आखड़ा में जादू टोने किये जाते हैं एवं दोषी व्यक्तियों को सजा दी जाती है। मुण्डा जनजाति प्रकृति पूजक होते हैं। इन लोगों में पुरखों की पूजा अर्चना का प्रचलन है।
त्यौहार – मुण्डा जनजाति के लोग विभिन्न त्यौहार मानते हैं। माघे पर्व में मुख्यतः पुरखों की मृत आत्माओं की पूजा की जाती है। ये लोग मुख्यतः फागो त्यौहार, बाहा-परब, होन-बा-परब, बतुली, करम, दसाई, सिंग-बोंगा, जोम नावा पर्व, सोहराई आदि त्यौहार मनाते हैं।