इसके अलावे कुछ बोंगा अथवा देवता की पूजा घर के सदस्य स्वयं करते हैं। परंतु इनके पूजारी अन्य उच्च जाति के लोग नहीं होते हैं। घर के सदस्य के रूप में प्रायः कोई पुरूष वर्ग होते हैं।
सरना का अर्थ :
शाब्दिक दृष्टि से ‘सरना’ दो शब्दों के योग से बना है। पहला ‘सर’ दूसरा ‘ना’। ‘सर’ का अर्थ ‘तीर’ एवं ‘ना’ का है ‘यहाँ’ के अर्थ में प्रयोग किया जाता है।
वस्तुतः ‘सर’ एवं ‘ना’ ध्वनि समूह विशेष रूप से संथाली एवं मुंडारी भाषा के शब्द हैं तथा इन दोनों शब्दों को जोड़ने का कार्य ‘सखुआ’ (साल) पेड़ करता है।
इस शब्द का व्यापक अर्थ एवं विश्लेषण सरना धर्म के उत्पत्ति में आगे किया गया है। यानी इनके धर्म के बुनियाद इसी सखुआ पेड़ के नजदीक हुआ है।
इस कारण प्रायः प्रकृतिक पूजक यानी सरना धर्मावलंबी सखुआ पेड़ को आदर, साकार मान सम्मान के साथ अपने-अपने स्वरूप में पूजते हैं।
सरना धर्म का तात्पर्य न केवल धार्मिक गतिविधि से लगाया जाता है बल्कि आदिवासी मूलवासी के परंपरागत सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन से भी इसका परिचय मिलता है।