सखुआ पेड़

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सरना का अर्थ :

शाब्दिक दृष्टि से ‘सरना’ दो शब्दों के योग से बना है। पहला ‘सर’ दूसरा ‘ना’। ‘सर’ का अर्थ ‘तीर’ एवं ‘ना’ का है ‘यहाँ’ के अर्थ में प्रयोग किया जाता है।

वस्तुतः ‘सर’ एवं ‘ना’ ध्वनि समूह विशेष रूप से संथाली एवं मुंडारी भाषा के शब्द हैं तथा इन दोनों शब्दों को जोड़ने का कार्य ‘सखुआ’ (साल) पेड़ करता है।

इस शब्द का व्यापक अर्थ एवं विश्लेषण सरना धर्म के उत्पत्ति में आगे किया गया है। यानी इनके धर्म के बुनियाद इसी सखुआ पेड़ के नजदीक हुआ है।

इस कारण प्रायः प्रकृतिक पूजक यानी सरना धर्मावलंबी सखुआ पेड़ को आदर, साकार मान सम्मान के साथ अपने-अपने स्वरूप में पूजते हैं।

सरना धर्म का तात्पर्य न केवल धार्मिक गतिविधि से लगाया जाता है बल्कि आदिवासी मूलवासी के परंपरागत सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन से भी इसका परिचय मिलता है।

सरना के बोंगा एवं भूत

सरना के बोंगा एवं भूत :

सरना धर्म में देवी-देवता को ‘बोंगा’ अथवा ‘भूत’ कहा जाता है। ये प्रकृति में पाये जाने वाले विभिन्न तत्व के रूप में होते हैं। इसमें इसी की पूजा की जाती है। यह बोंगा एवं भूत अन्य धर्म के देवी-देवता से बिल्कुल भिन्न प्रकार के होते हैं।

अर्थात सरना धर्म में मुख्य रूप से दो प्रकार के अलौकिक शक्तियों की पूजा की जाती है। पहला ‘बोंगा’ के रूप में दूसरा ‘भूत’ के रूप में यानी इनके धार्मिक शक्ति बोंगा एवं भूत के स्वरूप में पाया जाता है।

इसमें ‘बोंगा’ को देवता यानी हितकारी के श्रेणी में मानते हैं एवं इसकी पूजा परंपरा अनुसार वर्ष में तय समय में समुदाय के पुजारी द्वारा की जाती है।

दूसरी ‘भूत’ यह एक दूसरी प्रकार के बोंगा का स्वरूप होता है जो अहितकारी होते हैं। इसकी पूजा ओझा, भगत, पाटकर आदि करते हैं।

इसकी पूजा परंपरा के अनुसार प्रत्येक वर्ष नहीं की जाती है और इसका प्रभाव जिस पर पड़ता है वही केवल उसी समय करते हैं। इसमें दी जाने वाले बलि का जीव प्रायः काले रंग के होते हैं।

सरना धर्म के अनुयायी वर्षभर में कई प्रकार के देवता-भूत को पूजते हैं। साथ ही सभी समुदाय की अपनी-अपनी प्रधान बोंगा होता है।

इसको अपने जाति का सृष्टिकर्ता मानते हैं। इसे आदिवासी समुदाय अपने भाषा के आधार पर अलग-अलग नामों से पुकारते हैं।

मुंडा और हो समुदाय में ‘सिंगबोंगा’, उरांव समुदाय में ‘धर्मेस’, कुड़मी समुदाय में ‘बुढ़ा बाबा’ और ‘महामाई’, संताल में ‘मारांग बुरू’, खड़िया समुदाय में ‘पोनोमोसोर’ आदि होता है।

इसके अलावा कई और भी छोटे-बड़े बोंगा होते हैं जो अलग-अलग समुदाय अलग-अलग नामों से पुकारते हैं।

देवता (बोंगा / भूत) कुड़मि संताल मुंडा उरांव हो
वन कालकुदरा बुरूबोंगा बुरूबोंगा वीर बोंगा
पहाड़ जिआरी / चंडी चंडी चंडी बुरु बोंगा
खेत जाहिर बाट डुंगरी बेलागी बोंगा
बाड़ी कुदरा बाड़गे बकड़ी बोंगा
नदी / तलाब बानसिन मुडुभूत इकिर बोंगा इकिर बोंगा
घर भूत पिढहा अदिंग बोंगा चुल्हा आदिम बोंगा
पूर्वज भितरबुढ़ी हापड़ाम आदिंग बोंगा लुकु लुकमी
मासना / मसना मड़पथान हुहुड़राज मसना हड़बेड़ा ससानदिरी
गहाल गरइया गड़ा गोट बोंगा
खलिहान ठाकराइन कोलोम बोंगा
ग्राम बसमता जाहेर थान हातुबोंगा देशावली
देवता / तत्व कुड़मि संताल मुंडा उरांव हो
आदिदेव बुढ़ा-बाबा मरांगबुरू मरांगबोंगा
सूर्य धर्म बोंगा धोरम धर्मेश सिंडिबोंगा
चांद चंडुबोंगा
वायु ओतोड
अग्नि सेंगेल बोंगा
कष्ट डांड़ि /नजोम/ काड़ी
सूनसान डहर/ आहार बोंगा
परी चुडिन बगेया / बड़म
शुभ सगुन एरा बोंगा
कृषि आसाड़ी आसाड़ी आसाड़ीया बोंगा

यह सारे बोंगा प्रकृति के परिधि में अवस्थित पाया जाता है। इसके अलावा कई बोंगा को पूजते हैं जो कि सर्वव्यापी होते हैं।

इसकी पूजा किसी भी शुभ अवसर पर करते हैं। जैसे :-

इसके सभी प्रकार के देवी-देवता के प्रकृति या स्वभाव के आधार पर इसके सभी बोंगा और भूत को प्रमुख रूप से चार श्रेणी में रख सकते हैं :-

1. भलाई करने वाले बोंगा

यह केवल भलाई करते हैं। इसके अंतर्गत कुल देवता आते हैं।

2. कभी कभार हानि पहुँचाने वाले बोंगा

इसके परंपरा के अनुसार प्रत्येक वर्ष नियमित पूजते हैं। समयानुसार इसकी पूजा नहीं होने पर यह अपना कुप्रभाव गाँव, समाज में दिखाता है। परंतु पूजा एवं बलि देने पर पुनः शांत हो जाता है।

3. कुप्रभावित भूत

इसके परंपरा के अनुसार पूजते नहीं परंतु जिससे यह प्रभावित होते हैं, उनको इसके लिए सभी प्रकार के पर्व एवं अन्य सामाजिक कार्य के समय इसके नाम पर अलग से फैंक कर देते हैं।

4. गृह देवता / पूर्वज

यह पूर्वज के देवता होते हैं। यह घर परिवार के सभी सदस्यों को सभी प्रकार के कार्य में दिशा-निर्देश देते हैं। यह हर गलत कदम उठाते समय उनके मन को विचलित करते हैं अर्थात आगाह करते हैं।

घर-परिवार में बनने वाले चीजों में से सबसे पहले इसी को देते हैं फिर परिवार के सदस्य सेवन करते हैं। इसके अलावा चर भूत होता है। इनकी पूजा भी परंपरा के अनुसार नहीं होती है।

परंतु सभी कार्य, अन्य पूजा-पाठ के समय याद करके इसको कुछ चढ़ाया जाता है। परंतु इसके नाम पर कोई विशेष बलि नहीं दिया जाता है।

पूजारी (Priest)

सारना धर्म में की जानी वाली बोंगा अथवा भूत के पूजारी अन्य धर्म से हटकर एवं उसी जाति के होते हैं जिस जाति के बोंगा अथवा भूत होता है। यह पूजारी परंपरा से मनोनित होती है तथा प्रत्येक गांव एवं क्षेत्र के लिए अलग-अलग तय पुजारी होते हैं। सारना धर्म में पूजारी प्रमुख रूप से दो प्रकार के होते हैं:

1. साक्षात्कार: डॉ. जुरन सिंह मानकी, रांची, 14.02.2020

1. पाहान

धार्मिक कार्य में होने वाले बोंगा के पूजा के लिए उपयोग किया जाने वाला नाम।

2. ओझा / भगत

भूत एवं अन्य अहितकारी शक्ति के पूजा के लिए इन्हें प्रायः 'ओझा' अथवा 'भगत' कहा जाता है।

परंतु अलग-अलग जातीय समुदायों में इसके नामकरण अलग-अलग पाया जाता है। जैसे :-

सामुदायिक पूजारी तालिका (Community Priest Table)

पूजा का प्रकार कुड़मि संताल मुंडा उरांव हो
बोंगा पूजा नेइआ नायके पाहान नेगस दिवरी
भूत पूजा पटइत सखा देंवड़ा - देंवा

इसके अलावे कुछ बोंगा अथवा देवता की पूजा घर के सदस्य स्वयं करते हैं। परंतु इनके पूजारी अन्य उच्च जाति के लोग नहीं होते हैं। घर के सदस्य के रूप में प्रायः कोई पुरूष वर्ग होते हैं।

सारना स्थल (Sacred Sites)

सारना धर्म की उत्पत्ति सारना स्थल से हुई है। यह धार्मिक स्थल समुदाय और बोंगा के आधार पर भिन्न होते हैं।

कुड़मि

  • मड़प थान
  • जाहिर थान
  • कुदरा थान
  • जिआरि थान
  • गेराम थान
  • भितरबुढ़ि
  • गरइआ

संताल

  • जाहेर थान
  • जाहिरस्थान
  • जाहेर थान
  • हापड़ाम
  • गरइआ

मुण्डा

  • मसना
  • सारना
  • बाट
  • हातु बोंगा
  • अडिंग बोंगा
  • गड़ा

उराँव

  • मसना
  • जाहर
  • डंगरी

हो

  • ससानदिरि
  • खारप
  • बेलागी वोंगा
  • देशावली
  • मरांगबोंगा
  • गोंवा बोंगा
सारांश: कुड़मि एवं संताल समाज में इसे 'थान' कहा जाता है, जबकि मुण्डा एवं उराँव में इसे 'सारना' कहा जाता है।

सारना धर्म का स्वरूप

सारना धर्म सामाजिक, सांस्कृतिक और स्वशासन व्यवस्था के मामले में अन्य धर्मों से भिन्न है। यहाँ आराध्य शक्तियों के तुलनात्मक नाम दिए गए हैं:

हिंदू धर्म: देवता
ईसाई धर्म: ईश्वर / गॉड
सिक्ख धर्म: बाहे गुरू
इस्लाम: अल्लाह
सारना धर्म: बोंगा / भूत

बोंगा और भूत

ये सारना धर्म के दो अलग-अलग स्वरूपों में पूजे जाने वाले अलौकिक शक्तियाँ हैं। इनका कार्यक्षेत्र (परिधि) तय रहता है।

1. देउआ-भूता का स्वरूप

सारना धर्म में पूजे जाने वाले देउआ-भूता पूर्णतः प्राकृतिक स्वरूप में होती है। इनके प्रायः बोंगा अथवा देउआ-भूता पेड़ के तने के नीचे यानी इसके गोड़ा में स्थित होता है।

यह एक पत्थर के स्वरूप में पाया जाता है, जो कि उस पत्थर का कुछ अंश जमीन में धंसा हुआ एवं कुछ जमीन के ऊपर उठा हुआ रहता है।

इनके अलावे यह नदी, तालाब, झरना, जंगल, पहाड़ आदि की पूजा प्रत्यक्ष रूप से की जाती है। यह स्वरूप इनकी परंपरागत होती है। इसके स्वरूप में किसी प्रकार के बदलाव और परिवर्तन नहीं किया जाता है। अर्थात् यह देउआ-भूता का स्थान तय एवं अपरिवर्तनीय होता है।

विभिन्न समुदायों में नामकरण

मुंडारी, संताली, हो ‘बोंगा’
उरांव ‘चाला आयांग’
कुड़मि ‘भूत’

2. पूजा स्थल का स्वरूप

सारना धर्म में पूजा स्थल पूर्णतः प्राकृतिक स्वरूप में होता है। इसमें किसी प्रकार का कोई बनावटी चीजें नहीं होती है। प्रकृति में पाये जाने वाले पत्थर, पेड़, नदी, तालाब, पहाड़, जंगल, बाड़ी में स्थित देउआ-भूता की पूजा की जाती है।

इसके पूजन स्थल मंदिर, मस्जिद, गिरजा, चर्च, दरगाह आदि जैसे अन्य धर्मों के पूजा स्थल जैसा नहीं रहता है।

सारना धर्म में इसके पूजा स्थल बंद जगह पर नहीं होता है, यह खुले आसमान में होता है। इसके पूजा स्थल का नामकरण अपने जातिगत भाषा के अनुरूप अलग - अलग नामों से जाना जाता है।

जातिगत नामकरण

मुण्डारी: ‘सारना’
संताली: ‘जाहेर’
कुड़मि: ‘थान’
उरांव, हो एवं खड़िया: ‘सारना’

3. पूजन सामग्री का स्वरूप

सारना धर्म में की जाने वाले देउआ-भूता के समक्ष केवल प्राकृतिक एवं अपने घर में नियमतः अपने हाथों से बनाये हुए सामग्री का प्रयोग होता है। इसमें एक -

दौना आरुवा चावल
गुड़
घी
सिंदूर
काजर
गाय का दूध
हंड़िया
धूप-धुना
आग

आदि प्रमुख रूप से सभी प्रकार के देउआ-भूता के पूजन सामग्री के रूप में प्रयोग होता है। इनके अलावे कुछ विशेष देउआ-भूता के लिए और भी कई प्रकार के सामग्री होती है।

विशेष सामग्री

घर का पकाया हुआ आरुआ चावल का पिठा (पुवा)। यह दूध, गुड़ से सना हुआ एवं डालडा का छाना हुआ रहता है।

ध्यान दें: सारना धर्म में बेल एवं तुलसी पत्ता का प्रयोग प्रायः नहीं के बराबर होता है।

4. पूजारी का स्वरूप

सारना धर्म में पूजारी का स्वरूप एकदम साधारण होता है। इसके पहनावा नये एवं पुराने दोनों प्रकार के होते हैं। कुछ पूजा को पुराने कपड़े पहन कर करते हैं। इसमें पुराने वस्त्रों को पूजा के पूर्व भींगा कर सुखाया जाता है।

पुरुष पूजारी

पुरुष पुजारी केवल अपने कमर में गमछा अथवा धोती पहनते हैं। वे इसे कमर में 'छंउइट गोंज' कर पहनते हैं, जिससे पुजारी का दोनों घुटना दिखता है।

सारना धर्म में कुछ पूजा पुराने एवं भींगे कपड़े में ही की जाती है। पूजा में पूरूष पुजारी केवल अपने कमर में गमछा अथवा धोती पहनते हैं परंतु जिस प्रकार हिंदु धर्म में ब्राह्मण धोती पहन कर पूजा करते हैं, उस तरह का नहीं बल्कि अपने धोती अथवा गमछा को कमर में 'छंउइट गोंज” कर पहनते हैं, जिसमें पुजारी का दोनों घुटना दिखता है

महिला पूजारी

महिला पुराने साड़ी (भींगा कर सुखाया हुआ) बिना साइया-ब्लाउज के पहनती है। ये साड़ी को 'बाझा दाड़ि' किस्म का पहनती है, जिसमें साड़ी का आंचल कमर में गोंजा रहता है।

शुद्धि नियम: कुछ पूजा में पुजारी नये धोती पहनते हैं, परंतु पहनने के पूर्व वस्त्रों में पानी छिड़ककर शुद्ध किया जाता है। यानी बिल्कुल नये वस्त्र को प्रायः नहीं पहनते हैं।

5. पूजारी के बैठने का स्वरूप

सारना धर्म में पूजारी (पाहान) के बैठने का स्वरूप अन्य धर्मों से भिन्न होता है। पूजा के समय वे एक विशेष अनुष्ठानिक मुद्रा में बैठते हैं:

दायां पैर: घुटना पूर्णतः जमीन पर टिका रहता है और शरीर का भार उस पर होता है।

बायां पैर: 90° पर मुड़ा हुआ, घुटना ऊपर की ओर छाती से सटा रहता है।

बैठने की मुद्रा: चित्रात्मक प्रदर्शन

सारना पूजारी अनुष्ठानिक मुद्रा में

इस मुद्रा में दायां घुटना 'आधार' (Base) बनाता है, जबकि बायां छाती के पास 'एकाग्रता' (Focus) दर्शाता है।

6. बलि का स्वरूप

सारना एक बलि प्रधान धर्म है। इसमें बलि के जीव अपने घर-परिवार में पाले हुए पशु होते हैं। बलि मुख्य रूप से दो स्वरूप में दी जाती है: परंपरागत पूजा एवं मानसिक (मन्नत) पूर्ति हेतु।

पांठा (बकरा)
हलुआनि (Unmarried Goat)
भेड़ा
मुर्गा (काला/लाल/सफेद)
सुआार
काड़ा
कबुतर

बोंगा के लिए

बलि का जीव प्रायः लाल एवं सफेद रंग का होता है।

भूत के लिए

बलि का जीव काले रंग का होता है।

7. प्रणाम करने का स्वरूप

सामाजिक परंपरा (जोहार)

सामान्यतः एक-दूसरे से मिलते समय दोनों हाथ जोड़कर 'जोहार' शब्द का उच्चारण करते हुए झुककर प्रणाम किया जाता है।

कुड़मि समाज (गड़ लागा)

लड़का पैरों को 2 बार और लड़की 3 बार हाथों से सटाकर प्रणाम करते हैं।

संताल समाज

यहाँ लड़का और लड़की दोनों के लिए प्रणाम करने की अलग-अलग रीत प्रचलित है।

धार्मिक एवं पूजा स्थल

  • बोंगा पूजा: दोनों घुटने जमीन पर और सर झुकाकर।
  • संध्या दीप: दायें हाथ की उंगली कपाल पर सटाकर।
  • सूर्य प्रणाम: दोनों हाथ जोड़कर छाती से सटाकर।
  • वृक्ष: पेड़ चढ़ते समय तना को दो बार स्पर्श कर।

8. लक्ष्मी का स्वरूप

सारना धर्म में लक्ष्मी के प्रतीक केवल धन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे दैनिक जीवन की उपयोगी और पवित्र वस्तुओं में निहित हैं:

🌾

धान (प्रमुख)

🧹

झाड़ू

🔥

चुल्हा

👧

बेटी

सारना धर्म के सभी स्वरूप पूर्णतः प्राकृतिक और व्यावहारिक जीवन से जुड़े हैं। इसमें किसी भी प्रकार का दिखावटी या पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाला बनावटीपन नहीं होता।

1.3 सारना धर्म की विशेषता

सारना धर्म प्रकृति आधारित है, इसलिए इसकी मूल विशेषताएं प्रकृति के अनुरूप होती हैं। यह परंपरा और प्रकृति के गहरे जुड़ाव को धर्म के रूप में स्थापित करता है।

1. पत्थर पर बंउगा

आदिवासी समुदायों में बंउगा (भूत) का स्थान अक्सर पेड़ के नजदीक (गोड़ा) में गाड़े हुए एक पत्थर के रूप में होता है।
सारना धर्म से जुड़े सभी प्रकार के जातीय एवं आदिवासी समुदायों के बीच पाये जाने वाले इनके बंउगा यानी भूत, पेड़ के गोड़ा (नजदीक) में स्थित गाड़ा हुआ एक पत्थर अवश्य ही होता है। इसके पीछे राज यह है कि पहले जमाने में पत्थर गाड़कर सीमांकन किया जाता है। यह सीमांकन दो खेतों के बीच का हो, दो गांव, गांव के प्रवेशद्वार आदि के लिए किया जाता है। आधुनिक युग में इसी पद्धति से सीमांकन किया जाता है।

ऐतिहासिक महत्व: प्राचीन काल में पत्थर गाड़कर खेतों, गांवों और प्रवेशद्वारों का सीमांकन (Demarcation) किया जाता था। आधुनिक युग में भी यह पद्धति प्रचलित है।

2. प्रतीकात्मक भूत

सारना धर्म में देउआ-भूता प्रतीकात्मक होते हैं, जो सीधे तौर पर जन-जीवन और प्रकृति से जुड़े होते हैं।

सारना धर्म में पाये जाने वाले देउआ-भूता प्रतीकात्मक होते हैं। यह प्रतीक इनके जन-जीवन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए होते हैं। पूजा करने के पीछे उनके भाव, उद्देश्य जुड़े होते हैं। जैसे जंगल, पहाड़, नदी आदि की पूजा करने के पीछे इन प्राकृतिक चीजों के ऊपर इनका जीवन टिका रहने के कारण इसको उचित सम्मान देने के लिए इनकी पूजा करना अपना कर्तव्य समझते हैं। इस कारण संपूर्ण जंगल पहाड़ के पेड़ों को न करके उसी में से किसी एक पेड़ को प्रतीक के रूप में पूजते हैं।

पूजा का उद्देश्य

जंगल, पहाड़ और नदी पर जीवन टिका होने के कारण, उनके प्रति सम्मान प्रकट करना एक कर्तव्य माना जाता है।

प्रतीक का स्वरूप

पूरे जंगल या पहाड़ को पूजने के बजाय, उनमें से किसी एक विशेष पेड़ को प्रतीक मानकर पूजा की जाती है।

3. प्रत्यक्ष पूजा

सारना धर्म में पूजा का स्वरूप प्रत्यक्ष (Direct) होता है। यह परंपरा सदियों से अपरिवर्तनीय रही है।

☀️

सूर्य

🌙

चंद्रमा

🌊

नदि/तालाब

🌳

जंगल

विशेषता: पूजा उसी स्थान पर की जाती है जहाँ प्राकृतिक तत्व मौजूद होते हैं, बिना किसी बनावटी प्रतिमा के।

4. बलि देने की परंपरा

सारना धर्म एक बलि प्रधान धर्म है। यहाँ पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक अनुष्ठानों में पालतू पशुओं की बलि देने की प्राचीन परंपरा है।


सारना धर्म बलि प्रधान है। इसके अनुयायी अपने सभी प्रकार के पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक कार्यों में होने वाले पूजा-पाठ में किसी पालतु पशु की बलि देने की परंपरा पायी जाती है। यह बलि अलग-अलग बोंगा के पूजा के अवसर पर दी जाती है।

पांठा (बकरा)
हलुआनि
भेड़ा
सुअर
काड़ा
मुर्गा
कबुतर
बत्तक

अनुष्ठानिक महत्व: यह बलि विभिन्न अवसरों पर अलग-अलग बोंगा की संतुष्टि और पूजा के लिए अर्पित की जाती है।

5. पेड़ के नीचे बोंगा

सारना धर्म में बोंगा का वास प्राय: किसी पुराने और विशाल पेड़ के नीचे होता है। यह प्रकृति और अध्यात्म के अटूट संबंध को दर्शाता है।

क्षत्र-छाया और पत्थर

पेड़ की छाया में स्थित पत्थर पर ही सभी प्रकार के बोंगा अथवा भूत स्थापित रहते हैं।

अन्य निवास स्थान

पेड़ के अलावा बोंगा नदी, तालाब, कुंआ और घर के अंदर भी स्थित हो सकते हैं।

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सख्त मनाही: जिस पेड़ के नीचे बोंगा स्थापित हों, उस पेड़ को काटना पूर्णतः वर्जित है।

6. खुले असमान में पूजा स्थल

सारना धर्म में पूजा का स्थान बंद ढांचों के बजाय प्रकृति के सानिध्य में होता है। यह अन्य धर्मों से एक बड़ा अंतर दर्शाता है।

सार्वजनिक पूजा स्थल

बंद मंदिर के बजाय यह खुले आसमान के नीचे किसी पवित्र पेड़ के नीचे स्थित होता है।

घर के बोंगा (निवास)

घर के अंदर बोंगा के साथ परिवार के सदस्य एक साथ रहते हैं, जबकि अन्य धर्मों में पूजा स्थल पर मानव निवास वर्जित होता है।

7. अचल बोंगा

सारना धर्म में देउआ-भूता का स्थान तय और अपरिवर्तनीय होता है। यह पुरखों के समय से एक ही निश्चित स्थल पर स्थापित रहते हैं।

अपरिवर्तनीय स्थान

इनकी पूजा उसी निर्धारित स्थान पर होती है। परंपरागत स्थल से थोड़ा सा भी दूर पूजा करना सख्त वर्जित है।

स्थानांतरण का नियम

यदि किसी विशेष कारण से स्थान बदलना पड़े, तो इसके लिए विशेष पूजा और बलि का विधान अनिवार्य है।

तुलना: अन्य धर्मों की तरह यहाँ अस्थाई पूजा स्थल (पंडाल आदि) बनाकर पूजा करने की परंपरा नहीं है।

8. परंपरागत पूजा स्थल

सारना धर्म में पूजन स्थल परंपरा से ही तय रहता है। इसी निश्चित स्थान पर आने वाली पीढ़ियां निरंतर पूजा-अर्चना करती हैं।

9. परंपरागत पूजा

यहाँ पूजा का स्वरूप पूर्णतः परंपरागत होता है। पूजा का अनुष्ठान घर-परिवार के सदस्य स्वयं करते हैं।

10. पारिवारिक एवं सामूहिक बोंगा

सारना धर्म में बोंगा की पूजा मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित है:

1. पारिवारिक बोंगा

इसकी पूजा प्रत्येक परिवार द्वारा प्रतिवर्ष परंपरागत तरीके से संपन्न की जाती है।

2. सामूहिक बोंगा

यह पूरे गांव या पंचायत के लिए एक होती है। इसे सभी ग्रामीण मिलजुल कर मनाते हैं।

उदाहरण: ग्राम पूजा, चंडि पूजा, वाहा, दासांइ पूजा आदि।

11. निराकार देउआ-भूता

सारना धर्म में देउआ-भूता का स्वरूप पूर्णतः प्राकृतिक और निराकार होता है।

प्राकृतिक स्वरूप

यहाँ ईश्वरीय शक्ति का कोई मानवीय आकार नहीं होता। यहाँ किसी भी प्रकार की मूर्ति या कृत्रिम आकृति का निर्माण नहीं किया जाता है।

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शक्ति केवल प्रकृति के तत्वों में समाहित मानी जाती है।

12. देउआ-भूता का खरीद-बिक्री नहीं होना

सारना धर्म की एक अद्वितीय विशेषता यह है कि इसके आराध्यों का बाजार (Market) से कोई संबंध नहीं है।

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अन्य धर्मों की तरह यहाँ बाजार में कोई मूर्ति नहीं बिकती और न ही कोई इसे बनाता है।

प्राकृतिक परिधि

ये पुरखों द्वारा स्थापित स्थायी और प्राकृतिक स्वरूपों में होते हैं:

नदी तालाब सूर्य पेड़ पहाड़ खेत खलिहान

सारना पूजा विधियाँ एवं वेशभूषा

13. पूर्व अवस्था

देउआ-भूता की पूजा सदैव उनकी मूल और प्राकृतिक अवस्था में ही की जाती है, बिना किसी आधुनिक बदलाव के।

14-15. वेशभूषा (पहनावा)

पुरूष पूजारी: कमर में गमछा या धोती जिसे पीछे से 'छंइठ गोंज' कर पहना जाता है।
महिलाएँ: पूर्ण वस्त्र या साड़ी जिसे 'बाझा डाड़ि' शैली में धारण किया जाता है।

17. बैठने की मुद्रा

18. मानसिक करने की प्रथा

सारना धर्म में कुछ अनुष्ठान परंपरा के बजाय मानसिक (Vow) या गछने के आधार पर किए जाते हैं।

पर्व से पूर्व

यह संकल्प या मानसिक पर्व के शुरू होने से पहले किया जाता है।

पूर्ण होने पर

मनोकामना पूर्ण होने पर इसे शोधने के लिए प्रत्यक्ष या संकेत रूप में पूजा की जाती है।

शोधन विधि: इसे प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप में बलि के माध्यम से शोधते हैं।

19. हड़गड़ी की परंपरा

सारना संस्कृति में पूस (पौष) का महीना पूर्वजों को समर्पित होता है, जिसे 'हड़गड़ी' की परंपरा के रूप में मनाया जाता है।

वर्ष का अंतिम माह

इस समुदाय में पूस के महीने को वर्ष का आखिरी महीना माना जाता है।

वर्जित कार्य

पूर्वजों की याद और शोक की अवधि होने के कारण इस माह में सभी सगुन कार्य स्थगित रहते हैं।

✖ शादी ✖ गृह प्रवेश ✖ नया घर

20. बोंगा के तय परिधी

सारना धर्म में प्रत्येक देउआ-भूता का क्षेत्र और प्रभाव निश्चित होता है। उदाहरण के लिए, गांव के क्षेत्र में केवल हातु बोंगा (ग्राम देवता) की ही पूजा होती है। यहाँ अन्य बोंगा को स्थापित करना वर्जित है।

21. बोंगा: परिवार का सदस्य

बोंगा को परिवार का ही एक हिस्सा माना जाता है (जैसे पूर्वज का बोंगा)। इसलिए चढ़ावे में केवल घर पर बनी शुद्ध वस्तुएं ही अर्पित की जाती हैं। वे हमारे बीच रहकर विचारों का साझा करते हैं।